
महाराष्ट्र
के पालघर में साधुओं की निर्मम तरीके से हत्या की गई। करीब 12 साल पहले
ओडिशा में इसी तरह निर्ममता से स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार
शिष्यों की हत्या की गई थी। उस वक्त भी इसके पीछे ईसाई मिशनरियों और
माओवादियों का कनेक्शन सामने आया था।
पालघर
के जिस इलाके में साधुओं की मॉब लिंचिंग हुई वहॉं भी ईसाई मिशनरी सक्रिय
हैं। घटना के वक्त मौके पर एनसीपी और सीपीएम नेताओं के मौजूद रहने की बात
सामने आई है। हिंदू धर्म आचार्य सभा ने महाराष्ट्र के गवर्नर को जो पत्र
लिखा है उसमें स्पष्ट तौर पर कहा है कि इस इलाके के लोगों का ब्रेनवाश कर
हिन्दू धर्म के प्रति उनके मन में घृणा पैदा की गई है।
23
अगस्त 2008 को कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद और उनके शिष्यों की हत्या भी
सुनियोजित तरीके से की गई थी। जलेसपट्टा स्थित उनके आश्रम में हत्यारे
घुसे और उन्हें गोलियों से भून डाला। उनके मृत शरीर को कुल्हाड़ी से काट
डाला। चार अन्य साधुओं की भी हत्या कर दी गई।
कौन थे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती
स्वामी
लक्ष्मणानंद ओडिशा के वनवासी बहुल फुलबनी (कन्धमाल) जिले के गाँव गुरुजंग
के रहने वाले थे। बचपन में ही उन्होंने दुखी-पीड़ितों की सेवा में जीवन
समर्पित कर देने का संकल्प ले लिया। हिमालय से साधना साधना कर लौटने के बाद
वे गोरक्षा आंदोलन से जुड़ गए। प्रारंभ में उन्होंने वनवासी बहुल फुलबनी
के चकापाद गाँव को अपनी कर्मस्थली बनाया था।
धर्मांतरण
कर ईसाई बनाए गए लोगों की हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए उन्होंने
अभियान शुरू किया। उनकी प्रेरणा से 1984 में चकापाद से करीब 50 किलोमीटर
दूर जलेसपट्टा नामक वनवासी क्षेत्र में कन्या आश्रम, छात्रावास तथा
विद्यालय की स्थापना हुई। आज भी उस कन्या आश्रम छात्रावास में सैकड़ों
बालिकाएँ शिक्षा ग्रहण करती हैं।
1970
से दिसंबर 2007 के बीच स्वामी लक्ष्मणानंद पर 8 बार जानलेवा हमले हुए।
आखिरकार 23 अगस्त 2008 जब वे जन्माष्टमी समारोह में भगवान् श्रीकृष्ण की
आराधना में लीन थे माओवादियों ने निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी। उनकी
हत्या के बाद समूचा कंधमाल उबल पड़ा था। ओडिशा के अन्य भागों में भी
प्रदर्शन व आन्दोलन हुए।
निशाने पर क्यों थे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती?
ओडिशा
के घने जंगलों में मिशनरी की संदिग्ध और धर्मांतरण की गतिविधियों के खिलाफ
जोरदार अभियान चलाने वाले तथा आदिवासियों को चर्च के चंगुल में जाने से
बचाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या
की लगातार साजिश रची जा रही थी। स्वामीजी वहाँ व्यापक तौर पर सामाजिक सेवा
के कार्य में लगे थे। आदिवासी लड़कियों के लिए स्कूल व हॉस्टल चलाते थे।
उनके इस काम को मिशनरी के लोग धर्मांतरण के अपने मिशन में बाधा के तौर पर
देखते थे।
उनकी
हत्या का सूत्रधार और मुख्य आरोपी माओवादी नेता सब्यसाची पांडा था। क्राइम
ब्रांच ने इस मामले में माओवादी नेता पांडा सहित उसके 14 साथियों के खिलाफ़
विरुद्ध आरोप-पत्र दाखिल किया था। बाद में नौ आरोपी ही गिरफ्तार किए जा
सके। दुर्योधन सुना मांझी, मुंडा बडमांझी, सनातन बडमांझी, गणनाथ चालानसेठ,
बिजय कुमार सनसेठ, भास्कर सनमाझी, बुद्धदेव नायक और माओवादी नेता उदय को
सजा सुनाई गई। क्राइम ब्रांच ने सोमनाथ दंडसेना को भी इस मामले में
गिरफ्तार किया था। लेकिन अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में उसे बाद में बरी
कर दिया था।
मामले को दबाने की कोशिश
स्वामी
लक्ष्मणानंद सरस्वती पर तमाम तरह के झूठे आरोप लगाए गए। एक फादर के घर की
नौकरानी को नन बताकर बलात्कार का झूठा प्रचार किया गया। स्थानीय माओवादी
नेताओं ने भी इस बात को दबाने की बहुत कोशिश की। उस वक्त भाजपा महासचिव
पृथ्विराज हरिचंदन ने कहा था कि यह हत्या प्रायोजित थी। राज्य सरकार इस
हत्याकांड पर पर्दा डालना चाहती है।
रिपोर्ट्स
के अनुसार घटना के चार साल बीत जाने के बावजूद जानबूझकर मुख्यमंत्री के
निर्देश के कारण हत्यारों को गिरफ्तार नहीं किया गया था। लगातार विश्व
हिंदू परिषद् द्वारा हत्या में शामिल दोषियों की गिरफ्तारी की माँग की गई।
साथ ही ओडिशा सरकार से परिषद् के नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या
की जाँच के लिए बने दो न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने को
भी कहा गया।
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