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May 1, 2020

महाराष्ट्र-कॉन्ग्रेस नेत्री मेहर हैदर ने अस्पताल में दिखाई दादागिरी, वार्ड में घुसी, डॉक्टरों को बताया ‘शराबी’

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मेहर हैदर करीब 45 मिनट तक मुंबई के ग्लोबल हॉस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर में रहीं। डॉक्टरों को धमकाती रही। उनकी हरकतें सीसीटीवी में कैद है। बावजूद मुंबई पुलिस ने अस्पताल की केवल शिकायत ली है। अब तक FIR दर्ज नहीं की है।


मुंबई के एक अस्पताल में कॉन्ग्रेस की निगम पार्षद मेहर हैदर ने डॉक्टरों के साथ बदसलूकी की। रिपब्लिक टीवी के मुताबिक, ये वाकया 24 अप्रैल देर रात का है। इस पर संज्ञान आज यानी शुक्रवार (1 मई) को लिया गया। सीसीटीवी फुटेज में हैदर की हरकतें दर्ज हैं।

फुटेज पर ध्यान जाने के बाद ग्लोबल हॉस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर ने कॉन्ग्रेस नेत्री के खिलाफ पुलिस का रुख किया। लेकिन मामले के एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी मुंबई पुलिस ने अस्पताल की बात सुनकर हैदर के ख़िलाफ़ केवल शिकायत दर्ज की, FIR नहीं।

अपनी शिकायत में अस्पताल ने मेहर हैदर पर अवैध तरीके से अस्पताल में घुसने का आरोप लगाया है। अस्पताल ने कहा है कि हैदर 24 अप्रैल को बिना किसी जानकारी और पॉइंटमेंट के अस्पताल में आईं और नियम-कानून तोड़ते हुए ज़बरदस्ती मरीजों के वार्ड में घुस गईं।


अस्पताल का ये भी आरोप है कि वे इस दौरान परिसर में 45 मिनट तक रहीं। साथ ही डॉक्टरों को ‘शराबी’ कह कहकर उनपर चिल्लाती रहीं व धमकी देती रहीं कि वे अस्पताल को क्वारंटाइन सेन्टर में बदल देंगी।

सीसीटीवी फुटेज में साफ देख सकते हैं कि मेहर हैदर 4-5 लोगों के साथ अस्पताल में जबरदस्ती घुसती चली आईं। वहीं रिपब्लिक टीवी से बात करते हुए उन्होंने दावा किया कि अस्पताल में घुसते हुए उनकी स्क्रीनिंग हुई थी और उनके साथ मौजूद सभी लोगों की भी स्क्रिनिंग की गई थी।

इसके अलावा उन्होंने ऑन टीवी अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया और खुद को बेगुनाह बताने के लिए अस्पताल पर वीडियो से छेड़छाड़ का आरोप लगाया। वे ये कहती रहीं कि वीडियो तो अस्पताल के हाथ में हैं।

बता दें कि महाराष्ट्र में अब तक कोरोना के 9 हजार 915 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। 432 लोगों की संक्रमण के कारण राज्य में अब तक मौत हो चुकी है।

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महाराष्ट्र-कॉन्ग्रेस ने राज्यपाल कोश्यारी की टोपी से किया उत्तराखंड की संस्कृति और गढ़वाल रेजिमेंट का अपमान

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"यदि महामहिम राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी अपनी टोपी उतारने के बारे में सोचते है, तो वे निश्चित रूप से अपनी जिम्मेदारी को याद करेंगे और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को विधान परिषद के सदस्य के रूप में नियुक्त करेंगे। यह टोपी संवैधानिक जिम्मेदारी के लिए एक बाधा है।"

महाराष्ट्र में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी कॉन्ग्रेस और शिवसेना के निशाने पर हैं। ऐसे में महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस अब व्यक्तिगत टिप्पणियों के साथ ही उत्तराखंड की संस्कृति को भी निशाना बनाने से नहीं चूक रही है। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस प्रवक्ता सचिन सावंत ने महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की पारंपरिक टोपी पर कटाक्ष किया है, जो कि उत्तराखंड की संस्कृति के साथ-साथ भारतीय सेना की गढ़वाल और कुमाऊँ रेजिमेंट से भी है।
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महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत ने मराठी में ट्वीट करते हुए लिखा- “महामहीम राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी यांनी टोपी काढून विचार केला तर निश्चितपणे त्यांना आपल्या जबाबदारीची आठवण होईल आणि ते मुख्यमंत्री @OfficeofUT यांची विधानपरिषदेचे सदस्य म्हणून नियुक्ती करतील। ही टोपीच घटनात्मक जबाबदारीच्या आड येत आहे।”


जिसका हिंदी अर्थ है- “यदि महामहिम राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी अपनी टोपी उतारने के बारे में सोचते है, तो वे निश्चित रूप से अपनी जिम्मेदारी को याद करेंगे और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को विधान परिषद के सदस्य के रूप में नियुक्त करेंगे। यह टोपी संवैधानिक जिम्मेदारी के लिए एक बाधा है।”

सचिन सावंत द्वारा राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी द्वारा पहनी जाने वाली उत्तराखंड की पारंपरिक टोपी पर हमले का वास्ता सिर्फ उत्तराखंड की संस्कृति से ही नहीं बल्कि गढ़वाल और कुमाऊँ रेजिमेंट से भी है। भगत सिंह कोश्यारी उत्तराखंड राज्य से हैं और यह टोपी इस राज्य के पारंपरिक पहनावे का हिस्सा है।
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सचिन सावंत के इस ट्वीट पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ साथ उत्तराखंड के कई लोगों ने आपत्ति जताई है। CM रावत ने ट्वीट करते हुए लिखा – “महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता द्वारा महाराष्ट्र के राज्यपाल एवं हमारे आदरणीय श्री @BSKoshyari जी पर की गई अभद्र टिप्पणी देवभूमि की संस्कृति के अहम प्रतीक चिन्ह के अपमान के साथ देश की फौज का भी अपमान है; ज्ञात हो कि इस टोपी का संबंध गढ़वाल रेजिमेंट और कुमाऊँ रेजीमेंट से रहा है।”

उत्तराखंड के पूर्व CM हरीश रावत ने किया सचिन सावंत का समर्थन
कॉन्ग्रेस प्रवक्ता की बात का विरोध करने के बजाए बयान का राजनीतिक लाभ लेने के चक्कर में उत्तराखंड के पूर्व CM और 2 सीट से विधानसभा चुनाव हारने वाले कॉन्ग्रेस नेता हरीश रावत ने भी उनका समर्थन ही किया है।

अपमानजनक ट्वीट करने पर माफी माँगने के बजाए हरीश रावत के ही ट्वीट को शेयर करते हुए सचिन सावंत ने लिखा है – “मा. @tsrawatbjp जी, सिर्फ टोपी निकालकर निर्णय लीजिए ऐसा कहना अभद्र कैसे हुआ? वैसे कोश्यारीजी अपने टोपी का राजनीतिक मुद्दा राजनीतिक जीवन में पहले भी बना चुके हैं। वे जो टोपी पहनते हैं वो कुछ और ही है ऐसी उत्तराखंड में ही राय है। लोगों को गुमराह न करें।”

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राज्यपाल कोश्यारी पर की गई इस अपमानजनक टिप्पणी से नाराज लोगों ने कार्रवाई की माँग की है –

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April 29, 2020

उद्धव की 'कुर्सी' खतरे में, PM मोदी से की फोन पर बात

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उद्धव के मनोनीत एमएलसी बनने की कोशिशें को लेकर प्रदेश के बीजेपी नेताओं की बयानबाजी ने उनकी की चिंता और बढ़ा दी है.   

मुंबई: महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) को गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी (Bhagat Singh Koshyari) जल्द ही विधान परिषद का सदस्य मनोनीत कर सकते हैं. सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात की है. दरअसल, मुख्यमंत्री कुर्सी बचाने के लिए उद्धव ठाकरे को 28 मई से पहले प्रदेश के किसी भी सदन की सदस्यता हासिल करनी जरूरी है और विधान परिषद की एक सीट पर मनोनीत सदस्य बनाने के लिए महाराष्ट्र की कैबिनेट ने गवर्नर  को दो-दो बार अपनी सिफारिशें भेजीं लेकिन राजभवन ने खामोशी ओढ़ रखी है. 

सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री से इस बारे में चर्चा की है. महाराष्ट्र में सियासी संकट गहरा रहा है और उनके मनोनीत एमएलसी बनने की कोशिशें को लेकर प्रदेश के बीजेपी नेताओं की बयानबाजी ने सीएम ठाकरे की चिंता और बढ़ा दी है. शिवसेना नेताओं की मानें तो प्रधानमंत्री की मध्यस्थता पर राजभवन इस बाबत जल्द फैसला ले सकता है. महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे ने 28 नवंबर 2019 को एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिलाकर प्रदेश में महाविकास अघाड़ी की सरकार बनाई थी. इस लिहाज से मुख्यमंत्री कुर्सी पर बने रहने के लिए उद्धव ठाकरे को 28 मई से पहले तक प्रदेश के किसी भी सदन की सदस्यता हासिल करनी होगी. 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत  किसी भी सदन से जुड़े ना होने के बावजूद भी कोई भी शख्स 6 महीने तक मंत्रिमंडल में मंत्री या मुख्यमंत्री पद पर बने रह सकता है. और अब इन बदले राजनीति माहौल में ठाकरे को 28 मई तक किसी भी एक सदन का सदस्य बनने की संवैधानिक बाध्यता है अन्यथा उन्हें मुख्यमंत्री कुर्सी छोड़नी पड़ेगी.

दरअसल, महाराष्ट्र में बीते 26 मार्च को प्रदेश में 9 विधान परिषद सीटों पर चुनाव होना था लेकिन सूबे में कोर्ना संक्रमण के बढते खतरे की वजह से चुनाव अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया गया है. ठाकरे कैबिनेट ने 9 अप्रैल को भी महाराष्ट्र के गवर्नर को उद्धव को एमएलसी मनोनीत करने की सिफारिशी चिठ्ठी राजभवन को भेजी थी. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 171 के तहत राज्यपाल को कुछ निश्चित संख्या में विधान परिषद में सदस्यों को मनोनीत करने का संवैधानिक अधिकार हासिल है. 

एनसीपी के विधायकों के इस्तीफे की वजह से दो सीटें खाली हुई थीं जो पिछले साल के विधानसभा चुनावों से ऐन पहले बीजेपी में शामिल हो गए थे. सीएम ठाकरे को विधान परिषद का सदस्य मनोनीत करने को लेकर महाराष्ट्र के गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी ने अबतक कोई फैसला नहीं लिया है और इन दोनों नामांकित एमएलसी के कार्यकाल 6 जून को समाप्त हो रहे हैं. राजभवन की खामोशी को लेकर मुख्यमंत्री ठाकरे अगुवाई वाले गठबंधन महा विकास आघाडी की चिंता बढ़ गई है.

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दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग अध्यक्ष-कट्टर हिन्दुओं संभल जाओ, वरना अरबी मुसलमानों की आंधी ले आएंगे हम

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दिल्ली की अरविन्द केरजीवाल सरकार में माइनॉरिटी कमीशन (दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग) के अध्यक्ष ज़फरुल इस्लाम ख़ान ने भारत के हिन्दुओं को अरबी मुसलमानों की धमकी दी है। ज़फरुल इस्लाम ख़ान ने कुवैत को ‘भारतीय मुसलमानों के साथ खड़े होने’ के लिए धन्यवाद दिया है। अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि कट्टर हिन्दू ऐसा समझते थे कि बड़े स्तर पर आर्थिक रिश्तों को देखते हुए अरब देश भारत में हो रहे ‘मुसलमानों के अत्याचार’ को नज़रअंदाज़ कर देगा, जबकि कुवैत ने ऐसा नहीं किया।

ज़फरुल इस्लाम ख़ान ने भारत को दिखाया अरब का डर
ज़फरुल ने कहा कि कट्टर हिन्दू ये भूल गए थे कि अरबी मुसलमानों की आँखों में भारतीय मुसलमानों की साख काफ़ी ऊँची है। बकौल ज़फरुल, भारत के मुसलमानों ने इस्लाम के लिए जो किया है, उसे देखते हुए अरबी उन्हें सिर-आँखों पर रखते हैं। भारतीय मुसलमान अरबी और इस्लामी अध्ययन में पारंगत हैं, दुनिया को दुनिया भर में इस्लामी संस्कृति और सभ्यता से जुड़ी विरासत में अपने अहम योगदान दिया है।

ज़फरुल ने इन लोगों को शाह वलीहुल्ला देहलवी, अबू हस्सान नदवी, बहुदुद्दीन खान और ज़ाकिर नाइक का नाम गिनाया। बता दें कि मलेशिया में रह रहे ज़ाकिर नाइक को वापस लाने के लिए भारत सरकार प्रयत्न कर रही है और उसके ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर आतंकियों को भड़काने तक के आरोप हैं। भारत में कई जगह युवा कट्टर मुसलमानों के यहाँ से ज़ाकिर नाइक की सीडी मिली, जिसे देख कर वो आतंक की राह अपनाते रहे हैं।
दोस्तों में आप के समक्ष दिल्ली अल्पसंख्यक कमिशन के Chairman श्री जफरुल इस्लाम खान साहब का आज लिखी चिट्ठी की प्रति पेश कर रहा हूँ।
यह चिट्ठी बहुत कुछ कहता है
इस चिट्ठी में न केवल ज़ाकिर नायक को हीरो के रूप में प्रस्तुत किया गया है अपितु इसमें हमले(Avalanche) की धमकी भी दी गयी है।

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ज़फरुल ने चेताया कि कट्टर हिन्दुओं को शुक्र मनाना चाहिए कि भारत के मुसलमानों ने अरब जगत से कट्टर हिन्दुओं द्वारा हो रहे ‘घृणा के दुष्प्रचार, लिंचिंग और दंगों’ को लेकर कोई शिकायत नहीं की है और जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन अरब के मुसलमान एक आँधी लेकर आएँगे, एक तूफ़ान खड़ा कर देंगे। ज़फरुल इस्लाम ने मंगलवार (अप्रैल 28, 2020) को बयान जारी कर के ये बातें कहीं।

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष का CAA-NRC प्रदर्शन के दौरान काला इतिहास
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि ज़फरुल इस्लाम ने न सिर्फ़ ज़ाकिर नाइक को एक हीरो के रूप में प्रस्तुत किया है बल्कि भारत को अरबी मुसलमानों के हमले की भी धमकी दी है। ज़फरुल एनआरसी-सीएए आंदोलन के दौरान सीजेआई एसए बोबडे को पत्र लिख कर सरकार पर तरह-तरह के आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखना और विरोध करना सभी लोगों के मूलभूत अधिकारों में शामिल है। उन्होंने लिखा था:

“अभी देश भर के कई इलाक़ों में सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन चल रहा है, जिसमे पुलिस का व्यवहार काफ़ी आपत्तिजनक रहा है। पुलिस ने शांतिपूर्ण होने के बावजूद कई प्रदर्शनों को बंद कर दिया, कई जगह धारा-144 लगा दी और मोबाइल व इंटरनेट सेवाओं को ठप्प कर दिया। ये सब जनता को उनके अधिकार से वंचित रखने के लिए किया जा रहा है। मेरठ, बिजनौर, सीमापुरी और वाराणसी के अलावा दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर हमले भी किए। न सिर्फ़ प्रदर्शनकारियों के हाथ-पाँव व खोपड़ियाँ तोड़ दी गईं बल्कि 2 दर्जन को मार भी डाला गया।“

इस पत्र में दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष ज़फरुल इस्लाम ने पुलिस पर प्रदर्शनकारियों के घरों में घुस कर उन पर क्रूरता से हमला करने का भी आरोप मढ़ा था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने की अपील की थी। हालिया तबलीगी जमात मामले में भी ज़फरुल ने महामारी फैलाने वालों का महिमामंडन किया। उन्होंने दावा किया कि सरकार जमातियों से कोरोना के इलाज के लिए प्लाज्मा डोनेशन तो ले रही है लेकिन उनके साथ बड़े अपराधियों की तरह व्यवहार कर रही है।

हालाँकि, ये छिपा नहीं है कि सीएए विरोधी प्रदर्शन कितना ‘शांतिपूर्ण’ था। शाहीन बाग़ में चंद लोगों ने पूरी दिल्ली को बंधक बना आकर रखा और वहाँ पिकनिक मनाते रहे। इन्हीं प्रदर्शनों के कारण दिल्ली में हिन्दू-विरोधी दंगे हुए। साथ ही सीएए विरोध की आड़ में अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नज़र में देश को बदनाम करने की साज़िश रची गई। शरजील इमाम जैसों ने संविधान को ही भला-बुरा कहा।

स्वास्थ्य सुविधाओं को बताया कैदखाना
ज़फरुल ने दावा किया कि उन्होंने अब तक जितने भी आइसोलेशन सेंटर के बारे में जानकारी जुटाई है, हर जगह रह रहे लोगों ने बताया है कि वहाँ हज़ारों लोगों को बंद कर के रख दिया गया है और उन्हें समय पर भोजन नहीं दिया जा रहा है, बाहर से कुछ ख़रीदने भी नहीं दिया जा रहा है और उन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित रखा गया है। ये आरोप अजीब है क्योंकि क्वारंटाइन फैसिलिटी अपने-आप में स्वास्थ्य सुविधा है, जहाँ डॉक्टरों और नर्सों की निगरानी में मरीजों की अच्छी देखभाल की जाती है।

उन्होंने नंदनगिरी आइसोलेशन सेंटर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ 2000 लोगों को बड़े अपराधियों की तरह बंधक बना कर कैद कर दिया गया है। प्लाज्मा डोनेशन की बात करते हुए ज़फरुल शायद यह भूल गए कि दसियों हज़ारों लोगों के बीच कोरोना फैलाने के बाद एकाध ने प्लाज्मा डोनेट कर दिया तो इससे मरकज़ में जुटे हज़ारों जमातियों का गुनाह ख़त्म नहीं हो जाता। सोशल मीडिया पर उनके बयान का विरोध हो रहा है।

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तमिलनाडु सरकार का आदेश- 2895 मस्जिदों को 5450 टन फ्री चावल, 47 मंदिरों को देने होंगे ₹10 करोड़

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तमिलनाडु सरकार हिंदुओं के मंदिरों से हंडी संग्रह, प्रसाद, विभिन्न दर्शन टिकट, विशेष कार्यक्रम शुल्क, आदि के माध्यम से प्रतिवर्ष 3000 करोड़ रुपए से अधिक वसूल करती है, जबकि केवल 4-6 करोड़ रुपए रखरखाव के लिए दिए जाते हैं। बाकी 2,995 करोड़ रुपए सरकार के पास रहते हैं।

तमिलनाडु सरकार ने 47 मंदिरों को CM राहत कोष में ₹10 करोड़ रुपए देने का आदेश दिया है। इसके विपरीत राज्य सरकार ने 16 अप्रैल को रमजान के महीने में प्रदेश की 2,895 मस्जिदों को 5,450 टन मुफ्त चावल वितर‌ित करने आदेश दिया था, ताकि रोजेदारों को परेशानी ना हो। वास्तव में मदिरों को ऐसा आदेश देने के पीछे तमिलनाडु सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति जिम्मेदार है।

ऐसे समय में, जब मंदिर प्रशासन को सरकार के चंगुल से मुक्त कराने के लिए संघर्ष तेज हो रहा है, तमिलनाडु सरकार के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR and CE) ने 47 मंदिरों को गरीबों की देखभाल करने के लिए निर्धारित राशि के अलावा CM राहत कोष में 10 करोड़ रुपए अतिरिक्त देने का निर्देश दिया है।

भाजपा ने लगाईं मंदिरों में भोजन करवाने की स्वीकृति की गुहार
भाजपा की तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष एल मुरुगन ने शनिवार को अन्नाद्रमुक सरकार से गरीबों और साधुओं को भोजन कराने के लिए राज्य में हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के रखरखाव वाले मंदिरों में अन्नदानम (भूखों को भोजन परोसना) फिर से शुरू करने का आग्रह किया। मुरुगन ने कहा कि सरकार ने मुस्लिम समुदाय के लोगों की दलीलों का सम्मान किया है और रमज़ान के खाने के लिए मुफ्त चावल आवंटित किया है।

तमिलनाडु सरकार के इस निर्देश की आलोचना की मुख्य वजह यह भी है कि इस प्रकार का निर्देश इसाई और मुस्लिम संस्थानों को नहीं दिया गया है, जिन्हें सालाना सरकारी अनुदान प्राप्त होते रहते हैं। इससे पहले मद्रास हाईकोर्ट ने रमजान के महीने में मस्जिदों में मुफ्त चावल वित‌रित करने के तमिलनाडु सरकार के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया था।

इसके लिए पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के उस बयान को नजीर बनाया जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि सरकार किसी भी समुदाय को तीर्थयात्रा के लिए मदद देने के विचार के ‌विरोध में नहीं है। उदाहरण के लिए सरकार द्वारा कुंभ का खर्च वहन करने और भारतीय नागरिकों को मानसरोवर तीर्थ यात्रा में मदद का जिक्र किया था। हालाँकि पीठ ने यह जिक्र नहीं किया कि कोरोना के दौरान बंद मंदिर ऐसी स्थिति में सरकार के फैसले का क्या करें?

HR और CE के नियंत्रण में हैं राज्य के 47 मंदिर
HR और CE के प्रधान सचिव के पनिंद्र रेड्डी ने मदुरै, पलानी, थिरुचेंदुर, तिरुतनी, तिरुवन्नमलई, रामेश्वरम, मयलापुर सहित 47 मंदिरों में उनके अधीन काम करने वाले सभी अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे लॉकडाउन के कारण गरीबों को भोजन खिलाने की दिशा में सरप्लस फंड से 35 लाख रुपए का योगदान दें। अन्य मंदिरों को 15 लाख रुपए से 25 लाख रूपए तक की राशि देने के लिए निर्देशित किया गया है। सभी 47 मंदिरों को दस करोड़ के अधिशेष कोष को सीएम कोरोना रिलीफ फंड में स्थानांतरित करना है।

उल्लेखनीय है कि HR और CE तमिलनाडु में 36,612 मंदिरों का प्रबंधन करते हैं। ये संपन्न मंदिर अपने अधिशेष कोष से संरक्षण/ नवीकरण/बहाली करते हैं। लाखों पुजारी पूर्ण रूप से श्रद्दालुओं के दान पर निर्भर रहते हैं। कोरोना महामारी और देशव्यापी बंद के कारण अब वे असहाय हो चुके हैं और भुखमरी का सामना कर रहे हैं। इस पर तमिलनाडु राज्य सरकार ने उनकी मदद करने के बजाए अपनी तुष्टिकरण की राजनीति को साधने के लिए हिंदू मंदिरों की संपत्ति को निशाना बनाया है।


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मुस्लिमों में रमजान के पर्व की शुरुआत में ही, तमिलनाडु राज्य सरकार ने मुसलमानों को एक बड़ा लाभ देने की घोषणा की थी। दिवंगत सीएम जयललिता ने मुस्लिमों के दिलों और वोटों को जीतने के लिए इसे शुरू किया था। तमिलनाडु सरकार ने घोषणा की थी कि इस साल दलिया तैयार करने के लिए 2,895 मस्जिदों को 5,450 टन चावल दिया जाएगा, जो कि साधारण गणना के अनुसार 2,1,80,00,000 रुपए निकल आती है।

मुस्लिमों की तरह हिन्दुओं को नहीं मिलती है त्योहारों में कोई..
जबकि इसी प्रकार की कोई मदद या योजना चित्रा और अनादि महीनों के दौरान हिंदुओं के ग्राम देवताओं को प्रसाद तैयार करने के लिए नहीं दी जाती हैं। सभी लोग इस बात को जानते हैं कि लॉकडाउन के कारण मंदिरों में उत्सव रद्द कर दिए गए हैं लेकिन ऐसा लगता है कि हिंदू मंदिर के पैसे की कीमत पर मुसलमानों का तुष्टिकरण सरकार के लिए महत्वपूर्ण है।

वर्तमान तमिलनाडु सरकार की नीति से लगता है कि वह हिंदू मंदिरों को पूरी तरह से निचोड़ने का प्रयत्न कर रही है। तमिलनाडु सरकार हिंदुओं के मंदिरों से हंडी संग्रह, प्रसाद, विभिन्न दर्शन टिकट, विशेष कार्यक्रम शुल्क, आदि के माध्यम से प्रतिवर्ष 3000 करोड़ रुपए से अधिक वसूल करती है, जबकि केवल 4-6 करोड़ रुपए रखरखाव के लिए दिए जाते हैं। बाकी 2,995 करोड़ रुपए सरकार के पास रहते हैं।

वहीं, श्रीविल्लिपुथुर वैष्णवित मठ प्रमुख सदगोपा रामानुज जियार ने तमिलनाडु सरकार से मंदिर के पैसे को पुजारी और सेवकों को देने के लिए खर्च करने का आग्रह किया है। पुथिया तमीजगम के प्रमुख डॉ. कृष्णस्वामी ने सीएम से मंदिरों से प्राप्त 10 करोड़ रुपए की राशि वापस करने की अपील की है।

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