आज जब आरोपित महिला के ऊपर लगे आरोप इतने संगीन है उस समय उसके लिए रिपोर्ट में 'छात्र' और 'स्कॉलर' शब्द का प्रयोग हो रहा है। व उसके प्रोफेसर उसे उसके अपराधों से निजात दिलाने के लिए उसके अकादमिक रिकॉर्ड का हवाला दे रहे हैं। उस समय सोचने वाली बात है कि सफूरा के लिए जो उसकी प्रेगनेंसी के नाम पर ट्रेंड चलाया जा रहा है उसमें उसके 3 महीने से प्रेग्नेंट होने की बात हैं, जबकि दिल्ली में हुई हिंसा 2 महीने पुरानी घटना है।
दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में कट्टरपंथी समूह PFI का नाम सामने आने के बाद पुलिस ने जामिया के 2 छात्रों को इस संबंध में गिरफ्तार किया। एक नाम मीरान हैदर और दूसरा प्रेग्नेंट सफूरा जरगर (Safoora Zargar)। दोनों पर उत्तरपूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने की साजिश रचने का आरोप है। जिसके कारण इनके खिलाफ़ गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया गया है। हालाँकि, हैदर की गिरफ्तारी को लेकर अप्रैल माह के शुरूआत में खूब सवाल उठाए गए थे। लेकिन संगीन आरोपों के कारण ये आवाज हल्की पड़ गई। इसके बाद सफूरा की गिरफ्तारी पर कट्टरपंथियों ने आवाज बुलंद की और दिल्ली पुलिस का क्रूर चेहरा दर्शाने के लिए उसकी प्रेग्नेंसी को लेकर बवाल खड़ा कर दिया।
सफूरा के लिए अलजजीरा की मार्मिक रिपोर्टिंग
हिंदुओं पर अक्सर आक्रामक रिपोर्टिंग करने वाला अलजजीरा जैसे मीडिया संस्थान ने इस एंगल को लेकर बेहद मार्मिक रिपोर्ट पेश की। अपनी रिपोर्ट में अलजजीरा ने लिखा कि 27 वर्षीय गर्भवती (प्रेग्नेंट) महिला सफूरा जरगर को 10 अप्रैल को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया और उसपर साजिशकर्ता होने का आरोप लगाया।
इसके अलावा उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कुछ अन्य बातों का भी उल्लेख किया जैसे जामिया कॉर्डिनेशन कमेटी के बयान को, जिसमें उन्होंने सीएए को मुस्लिम विरोधी बिल बताया और जरगर के परिजनों के बयान को भी शामिल किया जिसमें उन्होंने कहा कि रमजान का पहला दिन सफूरा के बिन बहुत दुख में बीता।
इतना ही नहीं, रिपोर्ट में तिहाड़ के हालातों का भी उल्लेख किया गया कि और बताया गया है कि तिहाड़ जेल का परिसर भारत की सबसे भीड़भाड़ वाली जेलों में से एक है जिसमें लगभग दोगुने कैदी बंद हो सकते हैं।
सोशल मीडिया पर सफूरा के समर्थन में कट्टरपंथी व सेकुलरों की माँग
अब अलजजीरा की इस रिपोर्ट के बाद अगले चरण में मीडिया गिरोह के लोगों ने अपना काम करना शुरू किया। ये रिपोर्ट तेजी से शेयर की जाने लगी और सबा नकवी जैसे लोग ये सवाल करने लगे कि लोकतंत्र सीएए के खिलाफ प्रदर्शन का अधिकार देता है। तो एक प्रेग्नेंट महिला को एंटी टेरर चार्ज के नाम पर लॉकडाउन और महामारी के बीच क्यों गिरफ्तार किया गया? उसका बच्चा क्या जेल में पैदा होगा?
कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय संयोजक हसीबा आमीन ने लिखा, “27 वर्षीय जामिया की स्कॉलर ने, जो कि 3 माह की गर्भवती है, उसने अपने रमजान का पहला दिन तिहाड़ जेल में बिताया। क्यो? क्योंकि उसने सरकार द्वारा किए जा रहे गलत कामों के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत दिखाई।”
Safoora, 27-year-old research scholar from JMI who is in the second trimester of her first pregnancy has spent her first day of Ramadan in the high-security Tihar jail. Why? Witch-hunted for having the courage to speak against the wrongdoings of the govt. aljazeera.com/news/2020/04/i…
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इसके बाद सीएनएन की पत्रकार जेबा वारसी ने लिखा कि ये जामिया की मीडिया कॉर्डिनेटर है और ये जामिया के बाहर हुए शार्तिपूर्ण प्रोटेस्ट में शामिल थी। ये गर्भवती हैं। अलजजीरा की रिपोर्ट कहती है कि इसे तिहाड़ में एकांत में रखा गया है।
THIS- Safoora Zargar was the media coordinator for @Jamia_JCC , a student of #JamiaMilliaIslamia
She was involved in the student protest outside the campus, which remained peaceful.
She’s pregnant.
This report says she’s kept in solitary confinement. aljazeera.com/news/2020/04/i…
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इसी तरह अलजजीरा की इस खबर को दलित विरोधी इरेना अकबर समेत कई लोगों ने सोशल मीडिया पर शेयर किया और एक माहौल बनाने की कोशिश की, कि क्योंकि जामिया की छात्र नेता सफूरा जरगर 3 महीने की गर्भवती हैं। इसलिए उस समय में जब उन्हें उचित देखभाल और चिकित्सकीय देख-रेख की आवश्यकता है। तब उन्हें गिरफ्तार किया गया है और तिहाड़ में अकेले रखा गया है। कुछ लोगों ने तो सोशल मीडिया पर इस खबर के आधार पर मानवता के मरने का दावा भी किया है। कुछ ने कपिल मिश्रा के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की है।
अब हालाँकि, किसी भी महिला से संबंधित ऐसी खबर सुनकर किसी का भी दिल पसीज जाना आम बात है। लेकिन दिल्ली पुलिस पर सवाल उठाने से पहले, केंद्र सरकार को कोसने से पहले ये भी जानने की आवश्यकता है कि आरोपित महिला पर कैसे इल्जाम लगे हैं और मात्र प्रेगनेंसी का हवाला देकर उसपर लगे आरोपों को खारिज नहीं किया जा सकता और न ही इस बात से मुँह फेरा जा सकता है कि मीडिया गिरोह कैसे इस पूरे मामले को अलग कोण दे रहा है।
विचार करिए! आज जब आरोपित महिला के ऊपर लगे आरोप इतने संगीन है उस समय उसके लिए रिपोर्ट में ‘छात्र’ और ‘स्कॉलर’ शब्द का प्रयोग हो रहा है। व उसके प्रोफेसर उसे उसके अपराधों से निजात दिलाने के लिए उसके अकादमिक रिकॉर्ड का हवाला दे रहे हैं। उस समय सोचने वाली बात है कि सफूरा के लिए जो उसकी प्रेगनेंसी के नाम पर ट्रेंड चलाया जा रहा है उसमें उसके 3 महीने से प्रेग्नेंट होने की बात हैं, जबकि दिल्ली में हुई हिंसा 2 महीने पुरानी घटना है।
आज अगर वाकई ही इस एंगल से किसी के अपराध पर होने वाली कार्रवाई पर इतना फर्क पड़ता है, तो क्या जरूरत थी प्रेगनेंसी के दौरान सड़कों पर आने की, आंदोलनों में अपनी सक्रियता दिखाने की? अगर आज इस आधार पर सफूरा के लिए दया माँगी जाती है, उनकी जाँच को रोका जाता है, तो कल को क्या हर अपराधी महिला या अपराध करने के इल्जाम में गिरफ्तार हुई महिला प्रेगनेंसी के नाम पर अपने लिए छूट नहीं माँगेगी?
लोकतंत्र की बातें करने वाले ही ये बताएँ कि किस किताब में लिखा है कि गर्भवती होने के बाद लोगों को भड़काओ और जब पकड़े जाओ तो विक्टिम कार्ड खेल लो? आज सोशल मीडिया पर गिरोह का दोहरापन देखकर ऐसे तमाम सवाल तैर रहे हैं। लेकिन अलजजीरा की तर्ज पर अन्य मीडिया संस्थान इस एंगल से रिपोर्ट पेश करके इसे और मार्मिक रूप देने में लगे हैं और ये बता रहे हैं कि उसे सफूरा को क्वारंटाइन के नाम पर कैसे अलग रख कर परेशान किया जा रहा है। जबकि सच क्या है? ये किसी से छिपा नहीं हैं।
ज्ञात रहे कि दिल्ली में हुई हिंदू विरोधी हिंसा में मीरान हैदर के साथ सफूरा जरगर को साजिश करने के आरोप में आरोपित बनाया गया है। जिसमें उस समय 50 से ज्यादा निर्दोष लोगों की लाशें गिरी थीं और राष्ट्रीय राजधानी ने 1984 में सिखों नरसंहार के बाद मुख्य रूप से हिंदुओं को निशाना बनते देखा था। जिसमें दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काटकर नृशंस हत्या की वारदात को अंजाम दिया गया था और आईबी के अंकित शर्मा को सुनियोजित ढंग से मारा गया था।
साभार -ऑपइंडिया




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